





बाबा देवी साहब द्वारा निर्मित सत्संग नियमावली
1. सर्वमत्तो में कुछ-न-कुछ उपासना प्रचलित है, क्योंकि उसकी भी आवश्यकता है। अत: संतमत में भी उसको स्थिर रखा जा सकता है और इस मत में वह उपासना गुरु की होगी कि जिसका करना संतमत के प्रतिवादी अनुयाई का चाहे उसने कितनी ही उन्नति कर ली हो, कर्तव्य होगा।
2. सब लोग जो वार्षिकोत्सव में सम्मिलित होने के लिए आयेंगे अपने -अपने खाने-पीने तथा मार्ग -व्यय आदि के स्वयं आभारी होंगे हाँ, यदि किसी सत्संगी की परस्पर मित्रता अथवा सम्बन्ध हो तो वह उसकी आवभगत कर सकते हैं। सत्संग को इससे कुछ संबंध नहीं हैं।
3. सत्संग का उत्त्सव कम-से-कम सात दिन तक रहेगा और यदि तीन दिन और अधिक रखा जाय तो अच्छा होगा। किसी सभासद को सत्संग के उपदेश करने का अधिकार प्राप्त नहीं है कि जबतक वह उपदेश करने का प्रमाण-पत्र बाबा देवी साहब, मुरादाबाद अथवा बाबू राजेन्द्रनाथ सिंह, भागलपुर से प्राप्त न कर ले।
4. कोई सत्संग बाबा साहब या उक्त बाबूजी की आज्ञा के बिना नहीं खोला जाएगा।
5. सत्संग ऐसे स्थान पर खोलना चाहिए जहाँ कम-से-कम सात सत्संगी मनुष्य हों।
6. सत्संग में प्रविष्ट होने का शुल्क दस व पाँच रुपये होगा और वह संतमत के आचार्य के जीवन प्रयन्त रहेगा।
7. उपदेशक को भेट लेने का अधिकार होगा और वह उसको निजी कार्यों में व्यय कर सकेगा और जो सत्संगी किसी का भोजन न खाना चाहे, तो उसको आग्रहपूर्वक नहीं खिलाना चाहिए।
8. वार्षिकोत्सव में तन, मन और धन से गुरु की सेवा करनी आवशयक है | अतः प्रत्येक सभासद के कर्तव्य है कि अपनी शक्त्यनुसर भेंट, मिष्ठान और माला अर्पण करें।
9. सत्संग से सत्संगी को किसी भी दशा में नहीं निकाला जावेगा और प्रत्येक दशा में अपराधी मनुष्य सत्संग के वचन सुनने सत्संग करने का अधिकारी होगा।
10. सत्संग में परस्पर शास्त्रार्थी और वाद-विवाद का अधिकार न होगा। सत्संग में केवल सिखने के लिए आना चाहिए | सत्संग की तीन रीतियाँ होंगी-१ आंतरिक अभ्यास, २. वाणी का पाठ और ३. वचन। सत्संग में तीन पुस्तकों का पाठ होगा-घटरामायण , रामायण और धम्मपद।
11. ईसाई और मुसलमानों के मत का खंडन नहीं करना चाहिए , अपितु उनको उनका मत समझा देना चाहिए।